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विवाह या स्वार्थ पूर्ती ... स्त्री विमर्श Jagran Junction Forum

Posted On: 1 May, 2015 social issues,Junction Forum,Others में

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हाल ही मे एक युवा अभिनेत्री ने ” मेरा शरीर मेरी मर्ज़ी ” जेसा नारा दिया जो बहुत चर्चित हुया ! जिसमे शादी के बाद या शादी से पूर्व यौन संबंधो का भेद का विरोध और मर्ज़ी की घोषणा थी मे आज विवाह का एक नैतिक प्रमाण-पत्र मात्र रह गया है। यह एक ऐसा प्रमाण-पत्र हो गया है, जिसकी आड़ में स्त्री-पुरुष शारीरिक भुख तो मिटा रहे हैं, परन्तु ‘मन’ और ‘आत्मा’ का खुलेआम बलात्कार कर रहे हैं। फलस्वरूप सुसंतति का विषय गौन हो चुका है। जबकि विवाह का मुख्य उद्देश्य काम रूपी आनंद के साथ सुनियोजित संस्कारों से सुसंतति को जन्म देना है, ताकि धरती उपयुक्त मानसिकता के साथ ही शारीरिक सबल मानवजाति से परिपूर्ण हो सकें।
भारत के संविधान रचियताओं को भी इस विषय का ज्ञान था, इसलिए भारतीय दण्ड संहिता की की धारा 376 में इसका बखुबी उल्लेख किया गया है एवं धारा 377 में अप्राकृतिक संभोग तथा घरेलु हिंसा धारा 498अ में शारीरिक के साथ मानसीक प्रताड़ना को भी बलात्कार की श्रेणी में रखा गया है।वर्तमान समय के औद्योगिक एवं वैज्ञानिक परिवर्तनों से तथा पश्चिमी देशों में तलाकों की बढ़ती हुई भयावह संख्या के आधार पर विवाह की संस्था के लोप की भविष्यवाणी करने वालों की कमी नहीं है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस समय विवाह के परंपरागत स्वरूपों में कई कारणों से बड़े परिवर्तन आ रहे हैं। विवाह को धार्मिक बंधन के स्थान पर क़ानूनी बंधन तथा पति-पत्नी का निजी मामला मानने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। औद्योगिक क्रांति और शिक्षा के प्रसार से स्त्रियाँ आर्थिक दृष्टि से स्वावलंबी बन रही हैं। पहले उनके सुखमय जीवनयापन का एकमात्र साधन विवाह था, अब ऐसी स्थिति नहीं रही। विवाह और तलाक के नवीन क़ानून दांपत्य अधिकारों में नर-नारी के अधिकारों को समान बना रहे हैं। धर्म के प्रति आस्था में शिथिलता और गर्भनिरोध के साधनों के आविष्कार ने विवाह विषयक पुरानी मान्यताओं को, प्राग्वैवाहिक सतीत्व और पवित्रता को गहरा धक्का पहुंचाया है। किंतु ये सब परिवर्तन होते हुए भी भविष्य में विवाह प्रथा के बने रहने का प्रबल कारण यह है कि इससे कुछ ऐसे प्रयोजन पूरे होते हैं, जो किसी अन्य साधन या संस्था से नहीं हो सकते। पहला प्रयोजन वंश वृद्धि का है। यद्यपि विज्ञान ने कृत्रिम गर्भाधान का आविष्कार किया है किंतु कृत्रिम रूप से शिशुओं का प्रयोगशालाओं में उत्पादन और विकास संभव प्रतीत नहीं होता। दूसरा प्रयोजन संतान का पालन है, राज्य और समाज शिशुशालाओं और बालोद्यानों का कितना ही विकास कर ले, उनमें इनके सर्वांगीण समुचित विकास की वैसी व्यवस्था संभव नहीं, जैसी विवाह एवं परिवार की संस्था में होती है। तीसरा प्रयोजन सच्चे दांपत्य प्रेम और सुख प्राप्ति का है। यह भी विवाह के अतिरिक्त किसी अन्य साधन से संभव नहीं। इन प्रयोजनों की पूर्ति के लिए भविष्य में विवाह एक महत्त्वपूर्ण संस्था बनी रहेगी, भले ही उसमें कुछ न कुछ परिवर्तन होते रहें।[स्मृति काल से ही हिंदुओं में विवाह को एक पवित्र संस्कार माना गया है और हिंदू विवाह अधिनियम 1955 में भी इसको इसी रूप में बनाए रखने की चेष्टा की गई है। किंतु विवाह, जो पहले एक पवित्र एवं अटूट बंधन था, अधिनियम के अंतर्गत, ऐसा नहीं रह गया है। कुछ विधि विचारकों की दृष्टि में यह विचारधारा अब शिथिल पड़ गई है। अब यह जन्म जन्मांतर का संबंध अथवा बंधन नहीं वरन्‌ विशेष परिस्थितियों के उत्पन्न होने पर, (अधिनियम के अंतर्गत) वैवाहिक संबंध विघटित किया जा सकता है।हाल में आए मद्रास उच्‍च न्‍यायालय के फैसले से शादी और सेक्‍स को लेकर बहस एक बार फिर गरमा गई है। उच्‍च न्‍यायालय ने कहा है कि अगर दो व्‍यस्‍क सेक्‍स करते हैं तो उन्‍हें पति-प‍त्‍नी माना जाएगा। इससे पहले भी इसी तरह के ऐतिहासिक फैसले आते रहे हैं। उच्‍च न्‍यायलय से सर्वोच्‍च न्‍यायालय तक ने ऐसे फैसले दिए हैं। कुछ ही दिनों पूर्व सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने बलात्‍कार के एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा था कि शादी करने के इरादे के साथ सेक्‍स संबंध बनाने और किसी कारणवश शादी नहीं हो पाने की स्थ्‍िाति में युवक पर बलात्‍कार का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। इसी तरह दामिनी बलात्‍कार मामले के बाद सरकार ने आपसी सहमति से सेक्‍स की उम्र 18 साल से घटाकर 16 करने पर सहमति जताई, हालांकि इसे लागू नहीं किया जा सका। सभी धर्मों में भी सेक्‍स और शादी को लेकर तमाम बातें कही गई है। आइए देखते हैं सेक्‍स और शादी के बारे में क्‍या कहती हैं अदालते और धर्म।
शादी की हो नीयत तो सेक्स बलात्‍कार नहीं —

किसी बालिग युवती से शादी का इरादा हो व रजामंदी से सेक्स संबंध बने और किसी वजह से शादी नहीं हो तो पुरुष के खिलाफ दुष्कर्म का मुकदमा नहीं चल सकता। पिछले माह की 20 तारीख को सर्वोच्‍च न्‍यायालय के न्यायमूर्ति बीएस चौहान और दीपक मिश्र की पीठ ने कहा है कि यदि लड़की प्यार और जुनून में उसके साथ यौन संबंध बनाने को राजी हो जाती है और युवक का कोई गलत इरादा नहीं हो तो उसे दुष्कर्म का अभियुक्त नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने कहा कि दुष्कर्म और रजामंदी से यौन संबंध बनाने में अंतर है। किसी अभियुक्त को दुष्कर्म के मामले में दोषी ठहराया जा सकता है बशर्ते अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि अभियुक्त का इरादा गलत था और उसके गुप्त मकसद थे। अदालत निश्चित रूप से यह जांच करेगी कि क्या ऐसा कम उम्र में किया गया, अभियुक्त ने शादी का झूठा वादा करके संबंध बनाया, क्या यौन संबंध की सहमति पूरी तरह से प्रकृति और परिस्थितियों को समझ कर दी गई। ऐसा भी मामला हो सकता है कि महिला अभियुक्त के प्यार और जुनून में उसके साथ यौन संबंध बनाने के लिए तैयार हुई हो और अभियुक्त परिस्थितियों का पहले से अनुमान नहीं लगा पाया हो या वे परिस्थितियां उसके नियंत्रण से बाहर हों और इस वजह से वह उस महिला से शादी नहीं कर पाया हो जबकि उसका इरादा शादी करने का रहा हो। ऐसे मामलों के साथ निश्चित रूप से दूसरे तरह का व्यवहार होना चाहिए। इस मामले में एक युवक 19 वर्षीया महिला मित्र से शादी करना चाहता था। जांच में ऐसा नहीं पता चला कि उसका शादी का वादा झूठा था।

शादी का झांसा देकर सेक्स करना रेप
इसी माह की नौ तारीख को दिल्ली हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा कि झूठे भरोसे या शादी का वादा कर सेक्‍स के लिए किसी महिला की सहमति ली जाती है तो इसे महिला की स्वतंत्र सहमति नहीं माना जा सकता है। ऐसे में इस तरह से शारीरिक संबंध बनाए जाने को दुष्कर्म माना जाएगा। हाईकोर्ट के जस्टिस आरवी ईश्वर ने एक याचिका के सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की और कहा कि शादी का झांसा देकर किसी महिला के साथ शारीरिक संबंध बनाना यौन अपराध के दायरे में आएगा। कोर्ट ने यह टिप्‍पणी पत्नी से मारपीट करने के आरोपी अभिषेक जैन की अग्रिम जमानत की अर्जी खारिज करते हुए की। अभिषेक की पत्नी ने आरोप लगाया था कि उसने शादी करने के झूठे वादा करके शादी से पहले शारीरिक संबंध स्थापित किया था। अदालत ने कहा कि अभिषेक ने उसका शारीरिक शोषण किया है और सिर्फ इसलिए उससे शादी की, जिससे वह अपनी शिकायत वापस ले ले। कोर्ट ने कहा कि एफआईआर से जाहिर होता है कि अभिषेक समेत उसके परिवार ने उसके साथ ज्यादती की है। यदि झूठे आश्वासन या शादी का वायदा करके उसकी सहमति ली गयी तो इसे मुकम्मल और स्वतंत्र नहीं माना जा सकता और यह रेप का मामला होगा।

जीवनसाथी से जबरन सेक्स रेप नहीं: अदालत
पिछले दिनों दिल्‍ली की एक अदालत ने कहा कि वैवाहिक बलात्कार जैसा कोई मामला नहीं होता। यदि शादी कानूनन सही है तो सेक्स, क्यों न जबरन किया गया हो, वह रेप जैसा मामला नहीं है। पत्नी से रेप के आरोप में एक आरोपी को अदालत ने यह दलील देते हुए बरी कर दिया। पत्नी के साथ रेप करने के एक आरोपी को इस आधार पर आरोप मुक्त कर दिया कि अपनी जीवनसाथी के साथ यौन संबंध बनाना, भले ही वह जबरन बनाया गया हो, ‘वैवाहिक बलात्कार’ नहीं होता। अदालत ने कहा, ‘बचाव पक्ष के वकील ने बिल्कुल सही तर्क दिया कि आईपीसी की धारा में ‘वैवाहिक बलात्कार’ जैसा कोई मामला नहीं है। इस तरह का कोई कॉन्सेप्ट ही नहीं है। यदि शिकायतकर्ता कानूनी तौर पर आरोपी से ब्याही गई है तो आरोपी और उसके बीच सेक्स रेप नहीं कहलाएगा। क्यों न सेक्स जबरन या उसकी इच्छा के बगैर हुआ हो।’

रजामंदी से सेक्‍स की उम्र
देश में रजामंदी से सेक्‍स की उम्र को लेकर विवाद बना हुआ है। पिछले दिनों राजधानी में दामिनी बलात्‍कार कांड को लेकर हुए विरोध-प्रदर्शनों के बाद सरकार सहमति से सेक्‍स की उम्र घटाकर 16 वर्ष करने वाली थी, लेकिन विरोध और विवाद को देखते हुए इस पर कोई फैसला नहीं लिया जा सका। देश में कानूनी तौर पर 18 साल से अधिक उम्र के युवा सेक्‍स संबंध बना सकते हैं, लेकिन लड़कों के लिए शादी की उम्र 21 साल और लड़कियों के लिए 18 साल तय की गई है। सरकार और कुछ राजनीतिक दलों का तर्क था कि युवाओं में आपसी सहमति से शादी से पहले शारीरिक सं बंध का होना अब बड़ी बात नहीं है। ऐसे में इसकी उम्र 16 कर देना चाहिए।

क्‍या कहता है धर्म

भारत विभिन्न वर्गों और समुदायों वाला समाज है। अलग जाति, वर्ग, धर्म के लड़के-लड़की के बीच संबंध से यहां हिंसा भड़क सकती है। शादी से पहले सेक्स को यहां अब भी हौवा माना जाता है। हिंदू ऋषि मुनियों ने भी सेक्स को कभी बुरा नहीं कहा, हिन्दू धर्म में तो कामसूत्र जैसे शास्त्र भी लिखे गए हैं। पर इन सबके वावजूद सेक्स करने के कुछ नियम तय किए गए हैं। उनमें से एक सबसे बड़ा नियम है, विवाह, यानि शास्त्रों के अनुसार स्त्री पुरुष केवल विवाह उपरांत ही सेक्स कर सकते हैं| बिना विवाह के सेक्स करना पाप कहा गया है। ऐसा केवल हिन्दू धर्म में ही नहीं बल्कि दुनिया के सभी प्रमुख धर्मो में कहा गया है। बाइबिल में कहा गया है कि ये अच्छा है की कोई अविवाहित रहे या विदुर रहे पर यदि कोई अपनी काम इन्द्रीओं पर नियंत्रण नहीं रख सकता तो वो विवाह कर ले। यदि कोई अनैतिक सम्बन्ध बना के ईश्‍वर के नियमों को तोड़ता है तो निश्चय ही ईश्वर उसे सजा देगा। ईश्वर ने यौन क्रियाओं के लिए पति पत्नी बनाए हैं ताकि नैतिक और अनैतिक संबंधो में फर्क कर सके। इसी तरह कुरान में भी केवल अपनी पत्नी से ही सेक्स करने की इजाजत है कुल मिला के इस्लाम निकाह से पहले शारीरिक सम्बन्ध बनाने को हराम कहता है|
दिल्ली की एक अदालत ने विवाह से पहले यौन संबंध को ‘अनैतिक’ और ‘प्रत्येक धार्मिक मत’ के खिलाफ बताते हुए कहा है कि विवाह करने के वायदे के आधार पर दो वयस्कों के लिए यौन संसर्ग का प्रत्येक कृत्य बलात्कार नहीं हो जाता है।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश वीरेन्द्र भट ने यह भी कहा कि कोई महिला, विशेषकर वयस्क, शिक्षित और कार्यालय जाने वाली हो, जो विवाह के आश्वासन पर यौन संसर्ग करती है तो ऐसा ‘वह अपने जोखिम पर करती’ है।

न्यायाधीश ने कहा, मेरी राय में विवाह के आश्वासन पर दो वयस्कों के बीच होने वाले यौनाचार का प्रत्येक कृत्य अपराध नहीं हो जाता है, यदि बाद में लड़का इस वायदे को पूरा नहीं करता है।
उन्होंने कहा, ‘जब एक वयस्क, शिक्षित और ऑफिस जाने वाली महिला विवाह करने के आश्वासन पर खुद को अपने मित्र या सहयोगी के प्रति यौनाचार के लिए समर्पित करती है तो वह ऐसा अपने जोखिम पर करती है। उसे अपने इस कृत्य के बारे में समझना चाहिए और यह भी जानना चाहिए कि लड़के द्वारा अपने वायदे को पूरा करने की कोई गारंटी नहीं है।
सीपीआई (कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया) ने केंद्रीय मंत्री हरिभाई परातिभाई चौधरी की मैरिटल रेप (वैवाहिक बलात्कार) पर दिए गए उनके बयान के लिए आलोचना की। पार्टी ने कहा कि भारत और उसके मूल्यों के बारे में उनकी समझ सही नहीं है।

राज्यसभा में अपने लिखित जवाब में गृह राज्यमंत्री चौधरी ने कहा था कि मैरिटल रेप की अवधारणा को भारत में नहीं लागू किया जा सकता है, जहां विवाह को एक संस्कार माना जाता है। इस बयान को पूरी तरह से गलत बताते हुए सीपीआई पोलित ब्यूरो सदस्य बृंदा करात ने कहा कि विवाह प्रमाण पत्र किसी महिला के साथ जबरन यौन संबंध बनाने का लाइसेंस नहीं हो सकता।



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